हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, हम इस समय ग़ैबत के दौर में हैं और इमाम महदी, हज़रत वली-ए-अस्र (अ) के ज़ुहूर की प्रतीक्षा कर रहे हैं। ऐसे में इंतज़ार करने वालों के मन में एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है कि क्या उनके ज़ुहूर के समय हम उनके साथियों में होंगे या नहीं। यही चिंता यह सवाल पैदा करती है कि ग़ैबत के दौर में हमें क्या करना चाहिए, ताकि हम विलायत के मार्ग पर चलने का अभ्यास कर सकें और ज़ुहूर के लिए तैयार हो सकें।
इसी विषय पर नैतिक शिक्षा के विशेषज्ञ हुज्जतुल इस्लाम फ़रजी से हुई बातचीत का सार प्रस्तुत है।
प्रश्नः कभी-कभी हम सोचते हैं कि जब इमाम महदी (अ) का ज़ुहूर होगा, तब क्या हम उनके साथियों में होंगे या नहीं। हमें डर लगता है कि कहीं उस समय हम ग़लत रास्ता न चुन लें और विलायत के मार्ग से दूर न हो जाएँ।
तो प्रश्न यह है कि आज, इसी समय, हमें क्या करना चाहिए ताकि हम विलायत पर चलने का अभ्यास कर सकें और ज़ुहूर के लिए तैयार हो जाएँ?
उत्तर
बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम।
आपका प्रश्न बहुत महत्वपूर्ण है। यह चिंता कि कहीं इंसान ज़ुहूर के समय इमाम के साथ चलने के योग्य न बन पाए, बिल्कुल सही और गंभीर चिंता है।
जब तक इंसान अपने अंदर तैयारी पैदा नहीं करता, तब तक वह किसी बड़े उद्देश्य तक नहीं पहुँच सकता। केवल इच्छा कर लेना काफ़ी नहीं है। दुनिया में बहुत से लोगों की बहुत-सी इच्छाएँ होती हैं, लेकिन वे कभी पूरी नहीं होतीं। इसलिए इच्छा को एक ऊँचे और पवित्र लक्ष्य में बदलना चाहिए। लेकिन केवल बड़ा लक्ष्य बना लेना भी पर्याप्त नहीं है।
लक्ष्य तक पहुँचने के लिए वास्तविक प्रयास करना पड़ता है। इंसान को अपने अंदर वह क्षमता और तैयारी पैदा करनी होती है, जिससे वह उस लक्ष्य को हासिल कर सके।
अगर हम में से कोई इमाम महदी (अ) का साथी बनना चाहता है, तो उसे अपने आपको उनके क़रीब लाना होगा। इमाम महदी (अ) सच्ची बंदगी और वास्तविक दीनदारी का आदर्श हैं। उनसे पहले सभी नबी, औलिया और इमाम भी ऐसे ही थे।
इसीलिए ज़ियारत में हम पढ़ते हैं:
"मैं गवाही देता हूँ कि आपने नमाज़ क़ायम की, ज़कात अदा की, अच्छाई का हुक्म दिया और बुराई से रोका।"
इन शब्दों से पता चलता है कि वे अल्लाह के सच्चे बंदे और सच्चे दीनदार थे। इसलिए हम भी तभी उनके साथियों में शामिल हो सकते हैं, जब हम वास्तव में दीन पर चलने वाले बनें। केवल इच्छा करने से यह संभव नहीं होगा।
यदि मैं उनका साथी बनना चाहता हूँ और उनके साथ रहना चाहता हूँ, तो मुझे अपने चरित्र और जीवन को उनके जैसा बनाने की कोशिश करनी होगी। केवल दावा करने या इच्छा रखने से कोई वास्तविक परिवर्तन नहीं आता।
मरहूम आयतुल्लाह फ़ातेमीनिया एक सुंदर उदाहरण दिया करते थे। वे कहते थे कि यदि कोई व्यक्ति जंगल में फँस जाए और पास में एक झोपड़ी हो, जबकि एक हिंसक जानवर उसकी ओर बढ़ रहा हो, तो वह झोपड़ी में जाकर बच सकता है। लेकिन यदि वह वहीं खड़ा रहे और केवल इतना कहता रहे कि "मैं इस जानवर से बचने के लिए उस झोपड़ी में शरण लेता हूँ", मगर उसकी ओर एक कदम भी न बढ़ाए, तो जानवर आकर उसे नुकसान पहुँचा देगा।
यानी केवल बोलने से कुछ नहीं होता। बचने के लिए वास्तव में झोपड़ी की ओर चलना पड़ता है।
इसी तरह यदि हम किसी बच्चे को बचपन से अभ्यास न कराएँ, जैसे नमाज़ पढ़ना या हिजाब अपनाना न सिखाएँ और कहें कि अभी यह उस पर फ़र्ज़ नहीं है, बाद में सीख जाएगा, तो क्या यह उम्मीद की जा सकती है कि जैसे ही वह बालिग़ होगा, उसी दिन से सब कुछ सही ढंग से करने लगेगा?
जिसने पहले कभी अभ्यास ही नहीं किया और जो इस माहौल से परिचित ही नहीं रहा, वह एक ही दिन में न नमाज़ का पाबंद बन सकता है और न हिजाब का।
इमाम महदी (अ) का साथी बनने का मामला भी ऐसा ही है। यदि हमें उनके साथ चलना है, तो आज से ही "इमाम महदी के साथी बनने" और "दीन पर चलने" का अभ्यास करना होगा।
हमें अपनी क्षमता के अनुसार दीन पर अमल करना चाहिए। नमाज़ पढ़नी चाहिए, रोज़े रखने चाहिए और सभी फ़र्ज़ धार्मिक आदेशों का पालन करना चाहिए। सामाजिक और राजनीतिक समझ अपनी जगह महत्वपूर्ण है, लेकिन सबसे पहली और न्यूनतम ज़िम्मेदारी फ़र्ज़ इबादतों को निभाना है।
यदि कोई व्यक्ति नमाज़ न पढ़े, रोज़ा न रखे, मुस्ततीअ होने पर हज न करे, ख़ुम्स और ज़कात अदा न करे, तो वह इमाम की सहायता का दावा कैसे कर सकता है?
इसलिए हमें अपने लक्ष्य तक पहुँचने की तैयारी आज से करनी होगी। यदि हम केवल यह कहते रहें कि हम इमाम के साथी बनना चाहते हैं, लेकिन उस दिशा में कोई कदम न उठाएँ, तो हमारी स्थिति उसी व्यक्ति जैसी होगी जो झोपड़ी में शरण लेने की बात तो करता है, लेकिन उसकी ओर चलता ही नहीं।
वह अपनी जगह बैठा या खड़ा रहता है और कहता है, "मैं उस झोपड़ी में शरण लेता हूँ", लेकिन आगे नहीं बढ़ता। नतीजा यह होता है कि हिंसक जानवर आकर उसे नुकसान पहुँचा देता है।
ठीक उसी तरह, जिस बच्चे ने कभी नमाज़ या हिजाब का अभ्यास नहीं किया और जो इन बातों से कभी परिचित नहीं रहा, उससे यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि बालिग़ होते ही वह अचानक सब कुछ पूरी तरह निभाने लगेगा।
इसलिए यदि हम वास्तव में इमाम महदी (अ.ज.) के ज़ुहूर के लिए तैयार होना चाहते हैं, तो हमें अल्लाह की बंदगी और दीनदारी के रास्ते पर चलना होगा।
सबसे पहले हमें अपने धार्मिक विश्वासों को सही ढंग से समझना और उन्हें मज़बूत करना चाहिए। उसके बाद दीन के नियमों और आदेशों पर ईमानदारी से अमल करना चाहिए।
जब इंसान लगातार अल्लाह के आदेशों पर अमल करता है, तो उसके धार्मिक विश्वास उसके दिल में और अधिक मज़बूत हो जाते हैं और गहरे यक़ीन में बदल जाते हैं।
जब मज़बूत ईमान अच्छे कर्मों के साथ जुड़ जाता है, तब इंसान अपने अंदर वह क्षमता पैदा कर लेता है, जिससे वह इमाम महदी (अ.ज.) के सच्चे साथियों में शामिल होने के योग्य बन सकता है।
हम दुआ करते हैं कि अल्लाह हम सबको यह तौफ़ीक़ दे कि हम केवल ज़ुबान से नहीं, बल्कि अपने कर्मों से भी इमाम महदी (अ.ज.) के सच्चे साथी बनें और उन लोगों में शामिल हों जो उनके मुबारक दिल को प्रसन्न करते हैं।
आपकी टिप्पणी